सरकारी धन की निकासी के लिए आईडीएफसी फर्स्ट बैंक ने पाइप लाइन की तरह काम किया
हरियाणा सरकार की जमाओ में ही नहीं चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी परियोजना के भी 116.84 करोड़ निकाले

दो बड़े मामलों के खुलासे ने यह साबित किया है कि चंडीगढ़ स्थित आईडीएफसी फर्स्ट बैंक ने सरकारी धन की आपराधिक निकासी के लिए पाईप लाइन की तरह काम किया। हरियाणा सरकार विभिन्न विभागों के 590 करोड़ रुपए पहले इसी बैंक में जमा कराए गए और फिर इनकी निकासी फर्जी हस्ताक्षरों और कंपनियों के रास्ते निजी पॉकेट में हासिल कर किया गया।इसी तरह चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी परियोजना के 116.84 करोड़ रुपए की निकासी भी इसी तरह की गई।हरियाणा के धन की निकासी के मामले में सीबीआई ने पंचकूला की अदालत में 15 अभियुक्तों के खिलाफ पहला आरोपपत्र दायर कर दिया है।चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी परियोजना मामले में अभी जांच चल रही है।
चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड में 116.84 करोड़ के घोटाले के मामले में गिरफ्तार पूर्व चीफ फाइनेंशियल आफिसर (सीएफओ) नलिनी मलिक अब सरकारी गवाह बनना चाहती है। इसके लिए नलिनी ने बुड़ैल जेल से वार्डर के जरिए सीबीआई कोर्ट को एक अर्जी भेजी है। लिखा है कि अगर उसे सरकारी गवाह बनाया गया तो वह इस घोटाले से जुड़ी अहम जानकारियां दे सकती है। यानी नलिनी अब स्मार्ट सिटी और नगर निगम के कई बड़े अधिकारियों के राज खोलने को तैयार है। हालांकि इस अर्जी पर सीबीआई कोर्ट ने जांच एजेंसी से जवाब मांग लिया है। ऐसे में यह दिलचस्प होगा कि क्या सीबीआई भी नलिनी मलिक को सरकारी गवाह बनने को तैयार होगी।
करीब दो महीने पहले स्मार्ट सिटी और नगर निगम में 116.84 करोड़ रुपये की गड़बड़ी का यह मामला सामने आया था। जिसके बाद चंडीगढ़ पुलिस ने इसकी जांच शुरू की और कई लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली।पूर्व सीएफओ नलिनी मलिक की भी भूमिका सामने आई जिसके बाद दो अप्रैल को पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था। तब से वह जेल में ही है। अब उसने मेडिकल ग्राउंड पर जमानत अर्जी भी दायर की है जिस पर 26 मई को सुनवाई होगी। नलिनी के अलावा कई मामले में कई बैंक कर्मी भी गिरफ्तार हो चुके हैं।
हालांकि जांच के दौरान नगर निगम के कई बड़े अधिकारियों के नाम सामने आए थे, लेकिन चंडीगढ़ पुलिस उन्हें पकड़ नहीं सकी। अब मामले की जांच सीबीआइ कर रही है। ऐसे में उन अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।केस के मुताबिक स्मार्ट सिटी लिमिटेड का काफी फंड आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में जमा था। जब स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट खत्म हुआ तो बैंक खाते में जमा रकम को नगर निगम के को ट्रांसफर किया जाना था, लेकिन बैंक अधिकारियों ने इस फंड को निकालकर शेल कंपनियों के जरिए रियल एस्टेट में निवेश कर दिया था।जांच के अनुसार, जहां नगर निगम चंडीगढ़ के खाते में करोड़ों रुपये ट्रांसफर होने थे, वहां मात्र 81.20 रुपये की रकम ही स्मार्ट सिटी से मिली। बाकी सभी पैसा आरोपितों ने आपस में बांट लिया था।
आरोप है कि नलिनी मलिक ने अन्य अधिकारियों और आइडीएफसी बैंक कर्मियों ने मिलकर 11 फर्जी एफडी तैयार की ताकि किसी को शक न हो। फिर जाली कंपनियां बनाकर एफडी में पड़ी रकम को निवेश कर दिया। इसके अलावा बैंक अधिकारियों ने इस घोटाले को अंजाम देने के लिए स्मार्ट सिटी के भी कई बड़े अधिकारियों तक करोड़ों रुपये पहुंचाए थे।
दो महीने पहले चंडीगढ़ पुलिस ने स्मार्ट सिटी में 116.84 करोड़ और चंडीगढ़ रीन्यूल एनर्जी एंड साइंस एंड टेक्नोलाॅजी प्रमोशन सोसायटी(क्रेस्ट) में करीब 83 करोड़ के घोटाले का पर्दाफाश किया था। स्मार्ट सिटी और क्रेस्ट की बड़ी रकम आईडीएफसी बैंक में एफडी के रूप में जमा था।बैंक, नगर निगम और क्रेस्ट के अधिकारियों की मिलीभगत से इस रकम को शेल कंपनियों के जरिए रियल एस्टेट में निवेश किया गया। इसके बदले बैंक कर्मियों ने सरकारी अधिकारियों को मोटी रकम रिश्वत के रूप में दी थी।चंडीगढ़ पुलिस ने इस मामले में दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की थी, जिसे बाद में गृह मंत्रालय के आदेश पर सीबीआइ को ट्रांसफर कर दिया गया था। अब सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है।
: हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों से 590 करोड़ रुपए का गबन भी आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के रास्ते से हुआ। इस गबन मामले में सीबीआई ने पहली चार्जशीट दाखिल कर दी है। सीबीआई ने वीरवार को पंचकूला स्थित विशेष कोर्ट में यह चार्जशीट पेश की। मामले में बैंक अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों सहित कुल 15 आरोपियों को नामजद किया गया है।सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार, आरोपियों में आई डी एफ सी फर्स्ट बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक के 6 अधिकारी, हरियाणा सरकार के 3 कर्मचारी, 2 शेल कंपनियां व उनके 3 साझेदार और निदेशक तथा एक निजी व्यक्ति शामिल हैं। सभी आरोपी फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं।
जांच एजेंसी ने आरोपियों पर आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, फर्जीवाड़ा, सबूत नष्ट करने और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत अपराध करने के आरोप लगाए हैं।
चार्जशीट में घोटाले के प्रमुख किरदारों और घोटाले को अंजाम देने के तरीके का खुलासा किया गया। इसके अनुसार मुख्य साजिशकर्ता रिभव ऋषि आई डी एफ सी फर्स्ट बैंक की सेक्टर-32, चंडीगढ़ शाखा का मैनेजर था। बाद में इसने ए यू स्मॉल फाइनेंस बैंक जॉइन कर लिया था। इसे इस पूरे घोटाले का मास्टरमाइंड माना गया है। इसने फर्जी कंपनियों के नाम पर खाते खुलवाकर सरकारी धन को वहां डायवर्ट करने की साजिश रची। दूसरा मास्टर माइंड अभय है। यह आई डी एफ सी बैंक में रिलेशनशिप मैनेजर था। इसने अगस्त 2025 में इस्तीफा दे दिया था। जांच के अनुसार, अभय और रिभव ने मिलकर फर्जी चेक और भुगतान निर्देशों के जरिए करोड़ों रुपये की हेराफेरी की। स्वाति सिंगला आरोपी अभय की पत्नी है।
वह ‘स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स’ नामक कंपनी की मालकिन है (करीब 75फीसदी हिस्सेदारी)। आरोप है कि बैंक से फर्जी तरीके से निकाले गए करीब 300 करोड़ रुपए सीधे इसी कंपनी के खाते में ट्रांसफर किए गए थे। अभिषेक सिंगला स्वाति सिंगला का भाई है और उसी कंपनी में हिस्सेदार है। इसे भी फंड ट्रांसफर और मनी लॉन्ड्रिंग की प्रक्रिया में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। सरकारी अधिकारी और कर्मचारी अमित दीवान हरियाणा पावर जनरेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड में डायरेक्टर (फाइनेंस) के पद पर तैनात था। इसे मार्च 2026 में गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि इसने रिश्वत लेकर सरकारी धन को गलत तरीके से निजी बैंकों में जमा कराने और अवैध लेनदेन को अनदेखा करने में मदद की।
राजेश सांगवान वित्त और लेखा नियंत्रक थे, जिन्हें घोटाले में भूमिका के चलते सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। आरोपियों ने सरकारी धन lको डायवर्ट करने के लिए फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों का सहारा लिया । सरकारी पैसा निजी बैंकों में जमा किया गया और वहां से इसे ‘स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स’ जैसी शेल कंपनियों में भेज दिया गया। बैंक ने मुख्य राशि ब्याज सहित हरियाणा सरकार को वापस लौटा दी है।सीबीआई के मुताबिक, यह मामला हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों के बैंक खातों से करीब 504 करोड़ रुपए की राशि निकालने से जुड़ा है। आरोप है कि बैंक अधिकारियों ने संबंधित विभागों में तैनात सरकारी कर्मचारियों के साथ मिलीभगत कर इस फंड का दुरुपयोग किया।
जांच में हरियाणा पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड, विकास एवं पंचायत विभाग और हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद के कर्मचारियों की भूमिका सामने आई है। यह मामला पहले हरियाणा राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के पास दर्ज था। बाद में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं को देखते हुए जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी।
सीबीआई ने बताया कि 15 आरोपियों के खिलाफ जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल कर दी गई है, जबकि अन्य आरोपियों और अन्य विभागों में हुए संभावित गबन की जांच अभी जारी है। एजेंसी ने संकेत दिए हैं कि जल्द ही अतिरिक्त चार्जशीट भी दाखिल की जा सकती हैं।



